रौनक गजब की है
छाया है जब से कोहरा इस शहर में रौनक गजब की है
क्या हुआ मत पूछो हमसे आज यहां सर्दी गजब की है
हमको लग रहा है हर तरफ आज ये मौसम धुआं धुआं
जानने की मत करो कोशिश ये हवा किस सबब की है
कभी हवा में कभी पानी में यह जहर कहां से घुलता है
ना पूछो ये मौत कहां से आई ये कजां भी गजब की है
हर शाख पे ये बैठे उललू आज भी देख कर मौन क्यूं हैं
झूठ को नकार देने की उन की ये अदा भी गजब की है
तर-बतर हो रही हैं आज सङकें, क्यूं अपनों के लहू से
इन हादसों में शव गिनने की, ये कला भी गजब की है
यूं झाङ लेते हैं वो पल्ला हर एक जिम्मेदारी से अपना
जिस शान से बोलते हैं झूठ, ये अदा भी गजब की है
इस शहर में हर कोई जिस फिजां से, यूं रहता है परेशां
हम जिस हाल में जी रहे हैं, ये फिजां भी गजब की है
रोज नाटक नया करके खेलते हैं वो हमारी ही जान से
लूटने के नए बहानों की ये अदा भी गजब की है
खून करते हैं न जाने कितना, हर रोज हमारे भरोसे का
यादव से समझ लो तुम ये नादानी तो हम सब की है
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







